इंतज़ार
नहाया है रात चांदनी में लगता है स्वप्निल
लेकर बैठा हूँ, मनमे मेरा खोया हुआ मंज़िल
जब तुम यहाँ नाव से आई तब पानी बरस रहा था
जब तुम नाव से उतरी तब मेरा हाँथ भी पकड़ा था
हाथ के साथ मेरा दिल भी छू लिया था जैसे
समझ नहीं पाए तुम उसदिन, समझते कैसे ?
जाने कहा खो गए तुम कौन सी बिराने में
सुख दुःख की यादे आंसू बन गए आँखों में
सारा दिन उदास रहता मन लगता नहीं काम में
बे वजह मुस्कुराता हूँ मेरी पहली पहली प्यार में
रात और दिन कटते नहीं बिरह की शोले में
मन की बात लिख भेज रहा हूँ तुम्हारे झोले में
अब दिन गिनने में मेरा समय कटता है
इंतजार है कब तुम्हारा जबाब आता है
डॉ प्रदीप कुमार मोइत्रा २२/७/१७
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